चोर गणपति विद्या की लिखित विधि
भगवान् द्वारदेवताधिपति विघ्नेश्वर गणपति का ध्यान (जिनके पचास गण देहद्वारों में विघ्नकर्ता चोर के रूप में उपस्थित रहते हैं) तन्त्रशास्त्रों में निम्न प्रकार से बताया गया है -
अथ वक्ष्ये द्वारदेवध्यानं तन्त्रेषु गोपितम्।
देवद्वारं द्वारदेवाः स्वयमुच्चाटयन्ति ये॥ (हाहारावतन्त्र)
अब मैं तन्त्रों में गोपनीय द्वारदेव का ध्यान बताता हूँ, जिसके द्वारा द्वारदेवता स्वयं देवद्वार का उच्चाटन कर देते हैं।
ध्यानमन्त्र -
पाशाङ्कुशफलाम्भोजपाणिं पातालतुण्डिलम्।
वीरं विघ्नेश्वरं वन्दे गजवक्त्रं त्रिलोचनम्॥ (हाहारावतन्त्र)
अपने हाथों में पाश, अङ्कुश, फल और कमल का पुष्प धारण किए, पाताल (नीचे) की ओर मुख वाले, हाथी का मस्तक एवं तीन नेत्रों से युक्त वीर विघ्नेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ।
मूलक्रिया की सङ्क्षिप्त विधि -
पहली विधि (वर्णविलासतन्त्र के अनुसार)
हृदय - क्रों | दक्षिण कर्ण - हूं | वाम कर्ण - हूं | दक्षिण नासाच्छिद्र - क्रीं | वाम नासाच्छिद्र - क्रीं | मुख - स्त्रीं | नाभि - ऐं | लिङ्गमूल - ह्सौ: | गुदा - वं | भृकुटि के मध्य मनःस्थान - ॐ |
दूसरी विधि (गणेशविमर्शिनी के अनुसार)
हृदय - क्रों एवं ॐ | दक्षिण नेत्र - ह्रीं | वाम नेत्र - ह्रीं | दक्षिण कर्ण - ह्रीं | वाम कर्ण - ह्रीं | दक्षिण नासाच्छिद्र - हुँ | वाम नासाच्छिद्र - हुँ | मुख - स्त्रीं | नाभि - क्लीं | लिङ्गमूल - हसौः, (मतान्तर से ह्सौः या ह्सौं) | गुदा - वं | भौंह के मध्य मनःस्थान - हुं |
उपर्युक्त सभी अङ्गों में निर्दिष्ट बीजों में प्रत्येक बीज को दस अथवा (सिद्ध साधक हो तथा समयाभाव हो तो) एक बार जप करने से प्रत्येक द्वार में कपाट लग जाता है।
उद्घाटन विद्या के मूल मन्त्र -
मूलाधारे स्थिता देवी त्रिपुरा चक्रनायिका।
नृजन्मभीतिनाशार्थं सावधाना सदाऽस्तु मे॥१॥
स्वाधिष्ठानाख्यचक्रस्था देवी श्रीत्रिपुरेशिनी।
पशुबुद्धिं नाशयित्वा सर्वैश्वर्यप्रदाऽस्तु मे॥२॥
मणिपूरे स्थिता देवी त्रिपुरेशीति विश्रुता।
स्त्रीजन्मभीतिनाशार्थं सावधाना सदाऽस्तु मे॥३॥
स्वस्तिके संस्थिता देवी श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी।
शोकभीतिपरित्रस्तं पातु मामनघं सदा॥४॥
अनाहताख्यनिलया श्रीमत्त्रिपुरवासिनी।
अज्ञानभीतितो रक्षां विदधातु सदा मम॥५॥
त्रिपुराश्रीरिति ख्याता विशुद्धाख्यस्थलस्थिता।
जरोद्भवभयात्पातु पावनी परमेश्वरी॥६॥
आज्ञाचक्रस्थिता देवी त्रिपुरामालिनी तु या।
सा मृत्युभीतितो रक्षां विदधातु सदा मम॥७॥
ललाटपद्मसंस्थाना सिद्धा या त्रिपुरादिका।
सा पातु पुण्यसम्भूतिर्भीतिसङ्घात्सुरेश्वरी॥८॥
त्रिपुराम्बेति विख्याता शिरःपद्मे सुसंस्थिता।
सा पापभीतितो रक्षां विदधातु सदा मम॥९॥
ये पराम्बापदस्थानगमने विघ्नसञ्चयाः।
तेभ्यो रक्षतु योगेशी सुन्दरी सकलार्तिहा॥१०॥
अघमर्दिनी विद्या के मूल मन्त्र -
विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नमः।
नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतं (गतिं) हरिम्॥
चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम् ।
विष्णुमीड्यमशेषाणामनादिनिधनं विभुम्॥
(विष्णुमीड्यमशेषेण अनादिनिधनं विभुम्)
विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।
यच्चाहङ्कारको विष्णुर्यो विष्णुर्मयि संस्थितः॥
(यच्चाहङ्कारगो विष्णुर्यद्विष्णुर्मयि संस्थितः)
करोति कर्तृभूतोऽसौ (करोति कर्मभूतोऽसौ) स्थावरस्य चरस्य च।
तत्पापं नाशमायाति (नाशमायातु) तस्मिन्नेव हि चिन्तिते॥
ध्यातो हरति यत्पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात्।
तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्रणमामि नतिप्रियम् (प्रणतार्तिहरं हरिम्)॥
जगत्यस्मिन्निरालम्बे मधुसूदनमच्युतम्।
हस्तावलम्बनं स्तोत्रं विष्णुं वन्दे परात्परम्॥
(जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः।
हस्तावलम्बनं विष्णुं प्रणमामि परात्परम्॥)
सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।
हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोस्तु ते॥
नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव ।
दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शम पापं नमोस्तु ते (शमयाघन्नमोऽस्तु ते)॥
यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना ।
अकार्य्यमघमत्युग्रं तच्छमं नय केशव॥
ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।
जगन्नाथ जगद्धातः पापं शमय मेऽच्युत (पापं प्रशमयाच्युत)॥
यच्चापराह्णे सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।
कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता॥
जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।
नामत्रयोच्चारणतः सर्वे यान्तु मम क्षयम् (स्वप्ने यातु मम क्षयम्)॥
शारीरं मे हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष मानसम् (माधव)।
पापं प्रशममायातु (प्रशमयाद्य त्वं) वाक्कृतं मम माधव॥
यद्भुञ्जानः पिबंस्तिष्ठन्स्वपञ्जाग्रद्यदास्थितः।
अकार्षं पापमर्थार्थं कायेन मनसा गिरा॥
(यद्भुञ्जन्यत्स्वपंस्तिष्ठन् गच्छन् जाग्रद्यदास्थितः।
कृतवान् पापमद्याहं कायेन मनसा गिरा॥)
महदल्पमपि प्रायो दुर्योनिनरकावहम्।
तत्पापं प्रशमं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात्॥
(यत्स्वल्पमपि यत्स्थूलं कुयोनिनरकावहम्।
तद्यातु प्रशमं सर्वं वासुदेवानुकीर्तनात्॥)
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।
तस्मिन्प्रकीर्तिते विष्णौ यत्पापं तत्प्रणश्यतु॥
यत्प्राप्य न निवर्त्तन्ते गन्धस्पर्शादिवर्जिताः (वर्जितम्)।
सूरयस्तत्पदं विष्णोस्तत्सर्वं शमयत्वयम् (शमयत्वघम्)॥






