संपूर्ण सुंदरकांड - अर्थसहित - Sampoorna Sundarkand with Hindi Meaning

Hanumanji

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ 

श्रीजानकीवल्लभो विजयते 

श्रीरामचरितमानस

पद्ञम सोपान

सुन्दरकाण्ड 

 

श्लोक 

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं

ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌। 

रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं 

वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥ १॥ 

शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरन्तर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्यरूप में दीखने वाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि, राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥ 

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेsस्मदीये 

सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। 

भक्ति प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे 

कामादिदोषरहित॑ कुरू मानसं च॥२॥ 

हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिये॥ २॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं 

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌। 

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं  वातजातं नमामि॥ ३॥ 

अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [को ध्वंस करने ] के लिये अग्निरूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमानजीको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३॥

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

जाम्बवान्‌ के सुन्दर वचन सुनकर हनुमानजीके हृदय को बहुत ही भाये। [वे बोले--] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना॥ १॥

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ 

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियेँ धरि रघुनाथा ॥

जबतक मैं सीताजी को देखकर [लौट] न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में श्रीरघुनाथजी को धारण करके हनुमानजी हर्षित होकर चले॥ २॥ 

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥

बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

समुद्र के तीर पर एक सुन्दर पर्वत था। हनुमानजी खेल से ही (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्रीरघुवीर का स्मरण करके अत्यन्त बलवान्‌ हनुमानजी उसपर से बड़े वेग से उछले॥ ३॥ 

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥

जिस पर्वत पर हनुमानजी पैर रखकर चले (जिसपर से वे उछले), वह तुरंत ही पाताल में धँस गया। जैसे श्रीरघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमानजी चले॥ ४॥ 

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तें मैनाक होहि श्रमहारी ॥५॥

समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजी का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक ! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला हो (अर्थात्‌ अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)॥५॥

दो०--हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ १॥ 

हनुमानजी ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्रीरामचन्द्रजी का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?॥ १॥ 

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानें कहूँ बल बुद्धि बिसेषा॥ 

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ 

देवताओं ने पवनपुत्र हनुमानजी को जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धि को जाननेके लिये (परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा नामक सर्पों की माता को भेजा, उसने आकर हनुमानजी से यह बात कही-- ॥ १॥ 

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ 

राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ 

आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार  हनुमानजी ने  कहा--श्रीरामजी का कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजी की खबर प्रभु को सुना दूँ,॥२॥ 

तब तव बदन पैठिहउँ आईं। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥ 

कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥ 

तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा लेना] । हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपाय से उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमानजी ने कहा--तो फिर मुझे खा न ले॥ ३॥ 

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ 

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ 

उसने योजन भर (चार कोस में) मुँह फैलाया। तब हनुमानजी ने अपने शरीर को उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया। हनुमानजी तुरंत ही बत्तीस योजन के हो गये ॥ ४॥ 

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी, हनुमानजी उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ कोस का) मुख किया। तब हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥ 

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ 

और वे उसके मुख में घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा  माँगने लगे। [उसने कहा--] मैंने तुम्हारे बुद्धि-ललका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओं ने मुझे भेजा था॥६॥ 

 

दो०--राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ २॥

तुम श्रीरामचन्द्रजी का सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धि के भण्डार हो। यह आशीर्वाद  देकर वह चली गयी, तब हनुमानजी हर्षित होकर चले॥ २॥

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥ 

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ 

समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को पकड़ लेती थी। आकाश में जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे, वह जल में उनकी परछाईं देखकर ॥ १॥

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ 

सोइ छल हनूमान कहूँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ 

उस परछाई को पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [और जल में गिर पड़ते थे] इस प्रकार वह सदा आकाश में उड़नेवाले जीवों को खाया करती थी। उसने वही छल हनुमान्‌जी से भी किया। हनुमानजी ने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया॥ २॥ 

ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥ 

तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ 

पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमानजी उसको मारकर समुद्र के पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी। मधु (पुष्परस) के लोभ से भौरे गुंजन कर रहे थे॥३॥ 

नाना तरू फल फूल सुहाए। खग मृग बंद देखि मन भाए॥ 

सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ 

अनेकों प्रकार के वृक्ष फल-फूल से शोभित हैं। पक्षी और पशुओं के समूह को देखकर तो वे मन में [बहुत ही] प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उस पर  दौड़कर जा चढ़े॥४॥ 

उमा न कछु कपि कै अधिकाई | प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥ 

गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ 

[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्‌ की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभु का प्रताप  है, जो काल को भी खा जाता है। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी। बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता॥ ५॥ 

अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥

वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोने के परकोटे (चहारदीवारी) का परम  प्रकाश हो रहा है॥६॥  

छं०-- कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। 

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ 

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गने। 

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बने॥ 

विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर  घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ  है। हाथी, घोड़े, खच्चरों के समूह तथा पैदल और रथों के समूहों को कौन गिन सकता है! अनेक रूपों के राक्षसों के दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती ॥ १॥ 

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥

कहूँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ 

वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वो की कन्याएँ अपने सौन्दर्य से मुनियों के भी मनों को मोहे लेती हैं। कहीं  पर्वत के समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान्‌ मलल्‍ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ों में बहुत प्रकार से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते हैं॥२॥ 

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। 

कहेँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥ 

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछ एक है कही। 

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥ 

भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यतत करके (बड़ी सावधानीसे ) नगर की चारों दिशाओंमें (सब  ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भेंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे  हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी के  बाणरूपी तीर्थ में शरीरों को त्यागकर परमगति पावेंगे॥ ३॥ 

दो०--पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। 

अति लघु रूप धरों निसि नगर करों पइसार॥ ३॥ 

नगर के बहुसंख्यक रखवालों को देखकर हनुमानजी ने मन में विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप  धरूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ॥ ३॥ 

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ 

नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ 

हनुमानजी मच्छड़के समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नररूप से लीला करनेवाले भगवान्‌  श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके लङ्का  को चले। [ द्वारपर] लङ्किणी नामकी एक राक्षसी रहती  थी। वह बोली--मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है  ?॥१॥ 

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ 

मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ 

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना ? जहाँतक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि  हनुमानजी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर लुढ़क पड़ी॥ २॥ 

पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥ 

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥

वह लड्डिनी फिर अपने को सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी।  [वह बोली--] रावण को जब ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के  विनाश की यह पहचान बता दी थी कि--॥ ३॥ 

बिकल होसि तें कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संघारे॥ 

तात मोर अति पुन्य बहूता। देखे नयन राम कर दूता॥ 

जब तू बंदर के मारने से व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्रीरामचन्द्रजी के दूत (आप) को नेत्रों से देख पायी ॥ ४॥ 

दो०--तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। 

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४॥ 

हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़े पर रखे हुए] उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण)-मात्र के सत्संग से होता है॥४॥ 

प्रबेसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कोसलपुर राजा॥ 

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ 

अयोध्यापुरी के राजा श्रीरघुनाथ जी को हृदय में रखे हुए नगरमें प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो  जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है॥ १॥

गरुड़ सुमेरू रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥ 

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥ 

और हे गरुड़जी ! सुमेरु पर्वत उसके लिये रज के समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजी ने एक  बार कृपा करके देख लिया। तब हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान्‌ का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया॥ २॥ 

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥ 

गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ 

उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महल की खोज की | जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे , फिर वे रावण के महल में गये। वह अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥ ३॥ 

सयन किए देखा कपि तेही | मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥ 

भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ 

हनुमानजी ने उस (रावण) को शयन किये देखा; परन्तु महल में जानकी जी नहीं दिखायी दीं। फिर एक सुन्दर महल दिखायी दिया। वहाँ (उसमें) भगवान्‌का एक अलग मन्दिर बना हुआ था॥४॥ 

दो०--रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

नव तुलसिका बंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥ ५॥

वह महल श्रीरामजी के आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नों से अद्धित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहों को देखकर कपिराज श्रीहनुमान्‌जी  हर्षित हुएु॥५॥ 

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्न कर बासा॥ 

मन महुँ तरक करें कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ 

लड्ढा तो राक्षसों के समूह का निवासस्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष) का निवास कहाँ? हनुमानजी मन में इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे॥ १॥ 

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदय हरष कपि सज्जन चीन्हा॥

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी । साधु ते होइ न कारज हानी॥ 

उन्होंने (विभीषण ने) रामनाम का स्मरण (उच्चारण) किया। हनुमानजी ने उन्हें सज्जन जाना और हृदय में हर्षित हुए। [हनुमानजी ने विचार किया कि] इनसे हठ करके (अपनी ओर से ही) परिचय करूँगा, क्‍योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ ही होता है]॥२॥ 

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ 

ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमानूजी ने उन्हें वचन सुनाये (पुकारा) । सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम करके कुशल पूछी [ और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिये॥ ३॥ 

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ 

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥ 

क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं ? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदय में अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्‍या आप दीनों से प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने (घर- बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं ?॥ ४॥ 

दो०-- तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६॥ 

तब हनुमानजी ने श्रीरामचन्द्रजी की सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गये और श्रीरामजी के गुणसमूहों का स्मरण करके दोनों के मन [प्रेम और आनन्द में | मग्र हो गये॥ ६॥ 

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥ 

तात कबहूँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥ 

[विभीषणजीने कहा--] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतों के  बीच में बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझपर  कृपा करेंगे ॥ १॥  

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥ 

अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥ 

मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है। परन्तु हे हनुमान्‌! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजी की मुझपर कृपा है; क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते॥ २॥ 

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥ 

सुनहु बिभीषन प्रभु के रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ 

जब श्रीरघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओर से) दर्शन दिये हैं। [हनुमानजी ने कहा--] हे विभीषणजी ! सुनिये, प्रभु की यही रीति है कि वे सेवक पर सदा ही प्रेम किया करते हैं॥३॥ 

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥

प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले अहारा॥ 

भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ ? [जातिका] चञ्जल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ। प्रातःकाल जो हमलोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥ ४॥ 

दो०--अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कौन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७॥ 

हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजी ने तो मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमानजी के दोनों नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया॥ ७॥ 

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥ 

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ 

जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयों के पीछे] भटकते फिरते  हैं, वे दुखी क्‍यों न हों ? इस प्रकार श्रीरामजी के गुणसमूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की ॥ १॥ 

पुनि सब कथा बिभीषन कही | जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहडेँ जानकी माता॥ 

फिर विभीषणजी ने, श्रीजानकी जी जिस प्रकार वहाँ (लड्ढमें) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमानजी ने कहा-हे भाई! सुनो, मैं जानकी माता को देखना चाहता हूँ॥ २॥ 

जुगुति बिभीषन सकल सुनाईं। चलेड पवनसुत बिदा कराई॥ 

करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥ 

विभीषणजी ने [माता के दर्शन की] सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनायीं। तब हनुमानजी विदा लेकर चले। फिर वही (पहले का मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवन में (वन के जिस भाग में) सीताजी रहती थीं॥३॥ 

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥

कूस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी॥ 

सीताजी को देखकर हनुमानजी ने उन्हें मन ही में प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रि के चारों  पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओं की एक वेणी (लट) है। हृदय में  श्रीरघुनाथजी के गुणसमूहों का जाप (स्मरण) करती रहती हैं॥ ४॥ 

दो०--निज पद नयन दिए मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८॥

श्रीजानकीजी नेत्रों को अपने चरणों में लगाये हुए हैं (नीचे की ओर देख रही हैं) और मन  श्रीरामजी के चरणकमलों में लीन है। जानकीजी को दीन (दुखी) देखकर पवनपुत्र हनुमानजी बहुत ही दुखी हुए॥८॥ 

तरु पल्‍लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करों का भाई॥ 

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किए बनावा॥ 

हनुमानजी वृक्ष के पत्तों में छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ) ? उसी समय बहुत-सी स्त्रियों को साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया॥ १॥ 

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा॥ 

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी | मंदोदीी आदि सब  रानी॥ 

उस दुष्ट ने सीताजी को बहुत प्रकार से समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावण ने कहा-हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियों को--॥ २॥

तव अनुचरीं करउ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ 

तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ 

मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्रेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके जानकीजी तिनके की आड़ (परदा) करके कहने लगीं-- ॥ ३॥ 

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ 

अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ 

हे दशमुख ! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है ? जानकीजी फिर कहती हैं-- तू [अपने लिये भी] ऐसा ही मन में समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीर के बाण की खबर नहीं है॥ ४॥ 

सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ 

रे पापी! तू मुझे सूने में हर लाया है। रे अधम! निर्लज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती ॥ ५॥ 

दो०--आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। 

परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ ९॥ 

अपनेको जुगनू के समान और रामचन्द्रजी को सूर्य के समान सुनकर और सीताजी के कठोर वचनों को सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्से में आकर बोला--॥ ९॥

सीता तें मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥ 

नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥ 

सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाण से काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवन से हाथ धोना पड़ेगा!॥ १॥ 

स्थाम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥

[सीताजीने कहा--] हे दशग्रीव ! प्रभु की भुजा जो श्याम कमल की मालाके समान सुन्दर और हाथी की सूँड़के समान [पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठ में पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है॥ २॥

चंद्रहास हरू मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥

सीताजी कहती हैं--हे चन्द्रहास (तलवार) ! श्रीरघुनाथजी के विरह की अग्रि से उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलन को तू हर ले। हे तलवार! तू शीतल, तीत्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात्‌ तेरी धारा ठंढी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले॥३॥ 

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥ 
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ 

सीताजी के ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय दानव की पुत्री मन्दोदरी ने नीति कहकर उसे समझाया। तब रावण ने सब राक्षसियों को बुलाकर कहा कि जाकर सीता को बहुत प्रकार से भय दिखलाओ ॥ ४॥

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥ 

यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा॥ ५॥ 

दो०-- भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद । 
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥१०॥

[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियों के समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर  सीताजी को भय दिखलाने लगे॥ १०॥


त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्ही बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥

उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबों को बुलाकर अपना स्वप्र सुनाया और कहा--सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥ १॥

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥

स्वप्न में [मैंने देखा कि] एक बंदर ने लङ्का जला दी। राक्षसोंकी सारी सेना मार डाली गयी। रावण नग्न है और गदहेप र सवार है। उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥२॥

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहूँ बिभीषन पाई॥ 
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥

इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है और मानो लड्ढा विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा॥ ३॥

यह सपना मैं कहउेँ पुकारी। होइहि सत्य गए दिन चारी॥ 
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥

मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्र चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर 
रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं॥ ४॥

दो०--जहूँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। 
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११॥

तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा॥ ११॥

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तें मोरी॥ 
तजों देह करू बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ 

सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं--हे माता! तू मेरी विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता॥ १॥

आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥ 
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुने को श्रवन सूल सम बानी॥

काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीति को सत्य कर दे। रावण की शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानों से कौन सुने ?॥ २॥ 

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ 
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी । अस कहि सो निज भवन सिधारी॥

सीताजी के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [ उसने कहा--] हे सुकुमारी ! सुनो, रात्रि के समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥ ३॥

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला | मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥

सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं--[ क्‍या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाशमें अछ्गरे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता॥ ४॥

पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहूँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करू हरु मम सोका॥

चन्द्रमा अग्रिमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष ! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर॥ ५॥

नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ 
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ 

तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोग का अन्त मत कर (अर्थात्‌ विरह-रोगको बढ़ाकर सीमा तक न पहुँचा)। सीताजी को विरह से परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमानजी को कल्प के समान बीता॥ ६॥

सो०--कपि करि हृदय बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब। 
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥ १२॥ 

तब हनुमानजी ने हृदय में विचार कर [सीताजी के सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अज्जारा दे दिया। [यह समझकर] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया॥ १२॥

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥ 
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदय अकुलानी॥

तब उन्होंने राम-नाम से अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं॥ १॥

जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ 
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोले उठ हनुमाना॥ 

[वे सोचने लगीं--] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है ? और माया से ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमानजी मधुर वचन बोले--॥ २॥ 

रामचंद्र गुन बरनें लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥ 
लागीं सुनें श्रवन मन लाईं। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ 

वे श्रीरामचन्द्रजी के गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमानजी ने आदि से लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥ ३॥ 

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई | कही सो प्रगट होति किन भाई॥ 
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ 

[सीताजी बोलीं--] जिसने कानों के लिये अमृतरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई ! प्रकट क्यों नहीं होता ? तब हनुमानजी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गयीं; उनके मन में आश्चर्य हुआ॥ ४॥

 राम दूत में मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान कौ॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ 

[हनुमानजी ने कहा--] हे माता जानकी! मैं श्रीरामजीका दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजी ने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है॥५॥

नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥ 

[सीताजीने पूछा--] नर और वानर का संग कहो कैसे हुआ ? तब हनुमानजी ने जैसे संग हुआ था, वह सब कथा कही॥ ६॥ 

 दो०--कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। 
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ १३॥

हनुमानजी के प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजी के मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्मसे कृपासागर श्रीरघुनाथजी का दास है॥१३॥

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी । सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥ 
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥

भगवान्‌ का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। [सीताजी ने कहा--] हे तात हनुमान्‌! विरहसागर में डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥ १॥

अब कहु कुसल जाउेँं बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥ 
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥

मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मंगल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमलहदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्‌! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है ?॥२॥

सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥

सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं ? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अंगों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे ?॥ ३॥

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हों निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥

[मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रों में [विरह के आँसुओंका] जल भर आया। [बड़े दुःख से वे बोलीं--] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजी को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमानजी कोमल और विनीत वचन बोले-- ॥ ४॥

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥ 
जनि जननी मानहु जिये ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥

हे माता! सुन्दर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित [शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःख से दुखी हैं। हे माता! मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में आपसे दूना प्रेम है॥ ५॥

दो०--रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। 
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ १४॥

है माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजी का संदेश सुनिये। ऐसा कहकर हनुमानजी प्रेम से गदगद हो गये। उनके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥ १४॥

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहूँ सकल भए बिपरीता॥ 
नव तरु किसलय मनहुँ कूसानू । कालनिसा सम निसि ससि भानू॥

[हनुमानजी बोले--] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं। वृक्षोंक नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्निके समान, रात्रि कालसरात्रि के समान, चन्द्रमा सूर्यके समान॥ १॥

कुबलय बिपिन कुंततबन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ 
जे हित रहे करत तेड् पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥

और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु साँपके श्रासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी है॥२॥

कहेहू तें कछ दुख घटि होई। काहि कहां यह जान न कोई॥ 
तत्व प्रेम कर मम अरू तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥

मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ किससे ? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥३॥

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥ 
प्रभु संदेस सुनत बेैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥

और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेममें मग्र हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही॥ ४॥

कह कपि हृदय धीर धरू माता। सुमिर राम सेवक सुखदाता॥ 
उर आनहु रघुपति प्रभुताईं। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

हनुमानूजीने कहा--हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजी का स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो ॥ ५॥

दो०--निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। 
जननी हृदय धीर धरूु जरे निसाचर जानु॥ १५॥

राक्षसोंक समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें थैर्य धारण करो और राक्षसरोंको जला ही समझो॥ १५॥ 

जौं रघुबीर होति सुधि पाईं। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥ 
राम बान रबि उए जानकी। तम बरूथ कहँँ जातुधान की॥

श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ?॥१॥

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ 
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥

हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः ] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरोंसहित यहाँ आवेंगे॥ २॥

निसिचर मारि तोहि ले जेहहिं। तिहूँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ 
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना॥

और राक्षसोंकों मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने कहा--] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्‍हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान योद्धा हैं॥३॥

मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ 
कनक . भूधराकार सरीरा । समर भयंकर अतिबल बीरा॥

अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमानूजीने अपना शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेर) के आकारका (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान्‌ और वीर था॥४॥

सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप प्बननसुत लबऊ॥

तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमानूजीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥

दो०--सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। 
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ १६॥

है माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान्‌ बलवानको मार सकता है)॥१६॥ 

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥

भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमानजी की वाणी सुनकर सीताजी के मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजी के प्रिय जानकर हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शीलके निधान होओ॥ १॥

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥ 
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥।

हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेम में मग्र हो गये॥ २॥

बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयडें मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥

हनुमानजीने बार-बार सीताजी के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा-हे माता!अब में कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥३॥

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा । लागि देखि सुंदर फल रूखा॥ 
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी । परम सुभट रजनीचर भारी॥

हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृज्लों की देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [सीताजी ने कहा--] हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं॥ ४॥

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं | जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

[हनुमानूजीने कहा--] हे माता! यदि आप मन में सुख मानें (प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है॥५॥

दो०-- देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकी जाहु। 
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७॥

हनुमान्‌जी को बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजी ने कहा--जाओ। हे तात ! श्रीरघुनाथजी के चरणोंको हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ॥ १७॥

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरें लागा॥ 
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥

वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल खाये और वृशक्षोंकों तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे। उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार की--॥ १॥ 

नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥

[और कहा--] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षोंको उखाड़ डाला और रखवालों को मसल-मसलकर जमीन पर डाल दिया॥ २॥

सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेड हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥

यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमान्‌जी ने गर्जना की। हनुमान्‌जी ने सब राक्षसोंको मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये॥ ३॥

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग ले सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥

फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान्‌जीने एक वृक्ष [हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि (बड़े जोर) से गर्जना की ॥ ४॥

दो०-- कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि। 
कछु पुनि जाइ़ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ १८॥

उन्होंने सेनामें कुछकको मार डाला और कुछको मसल डाला और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान है॥ १८॥

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥ 
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥

पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [अपने जेठे पुत्र] बलवान्‌ मेघनाद को भेजा। (उससे कहा कि--) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरकों देखा जाय कि कहाँका है॥ १॥

ला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥ 
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥

इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमानूजीने देखा कि अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े॥२॥

अति बिसाल तरू एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥ 
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दढ़ निज अंगा॥

उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहार से] लंकेश्वर रावण के पुत्र मेघनाद को बिना रथका कर दिया (रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया) | उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमानजी अपने शरीर से मसलने लगे॥३॥

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहूँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरू जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥

उन सबको मारकर फिर मेघनाद से लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये हों। हनुमानजी उसे एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े। उसको क्षणभर के लिये मूर्च्छा आ गयी॥ ४॥

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवन के पुत्र उससे जीते नहीं जाते॥ ५॥

दो०--ब्रह्म अस्त्र तेहि साधा कपषि मन कीन्ह बिचार। 
जॉौं न ब्रह्मासर मानउ महिमा मिट॒ह अपार॥ १९॥

अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब हनुमानूजीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्र कों नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९॥

ब्रह्यणान कपि कहूँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥ 
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ 

उसने हनुमानजी को ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमानजी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाश से बाँधकर ले गया॥ १॥

जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥ 
तासु दूत कि बंध तरू आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी ! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धन को काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है ? किन्तु प्रभु के कार्य के लिये हनुमानजी ने स्वयं अपने को बँधा लिया॥२॥

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥ 
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥ 

बंदर का बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुक के लिये (तमाशा देखनेके लिये) सब सभा में 
आये । हनुमानजी ने जाकर रावण की सभा देखी । उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती ॥ ३॥

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भूकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नमप्नरताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमानूजीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशड्ड खड़े रहे जैसे सर्पोके समूहमें गरुड़ निःशड्ल (निर्भय) रहते हैं ॥ ४॥

दो०--कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद। 
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदय बिषाद॥ २०॥

हनुमानजी को देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र-वध का स्मरण किया तो उसके हृदय में विषाद उत्पन्न हो गया॥ २०॥


कह लंकेस कवन तें कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥ 
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखें अति असंक सठ तोही॥

लड्जपति रावणने कहा-रे वानर! तू कौन है ? किसके बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे अत्यन्त निःशड्डू देख रहा हूँ॥१॥

मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ्ट बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाह जासु बल बिरचति माया॥ 

तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्‍या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है? [हनुमानूजीने कहा-- ] हे रावण! सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी रचना करती है;॥ २॥

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन | अंडकोस समेत गिरि कानन॥

जिनके बलसे हे दशशीश ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमश: ) सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बल से सहस्रमुख (फणों) वाले शेष जी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्माण्ड को सिर पर धारण करते हैं;॥ ३॥

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥ 
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥ 

जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्शोंको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया॥ ४॥ 

खर दूषन त्रिसिर अरू बाली। बधे सकल अतुलित बल साली॥ 

जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरग और बालिको मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान्‌ थे;॥ ५॥ 

दो०--जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। 
तासु दूत में जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ २१॥ 

जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्‌को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [चोरीसे] हर लाये हो, मैं उन्हींका दूत हूँ॥२१॥ 

जानउँ में तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥ 
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ 

मैं तुम्हारी प्रभुताकों खूब जानता हूँ, सहस्नबाहुसे तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमान्‌जीके [मार्मिक]| वचन सुनकर रावणने हँसकर बात टाल दी॥ १॥

खायें फल प्रभु लागी भूखा। कपि सुभाव तें तोरेडे रूखा॥ 
सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ 

हे [राक्षसोंके] स्वामी ! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके ) मालिक ! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्गपर चलनेवाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे॥ २॥

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउे तनय तुम्हारे॥ 
मोहिन कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहऊँ निज प्रभु कर काजा॥

तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझको बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभु का कार्य किया चाहता हूँ॥ ३॥

बिनती करें जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥

हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भ्रम को छोड़कर भक्तभयहारी भगवान को भजो॥ ४॥ 

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥ 
तासों बयरू कबहूँ नहिं कीजे । मोरे कहें जानकी दीजै॥

जो देवता, राक्षत और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल भी जिनके डर से अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहने से जानकीजी को दे दो॥५॥

दो०-- प्रततपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गए सरन प्रभु राखिहँ तव अपराध बिसारि॥ २२॥

खर के शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतों के रक्षक और दया के समुद्र हैं। शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरण में रख लेंगे॥ २२॥

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥

तुम श्रीरामजी के चरणकमलोंको हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चन्द्रमा के समान है। उस चन्द्रमा में तुम कलंक न बनो॥ १॥

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥ 

रामनाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोह को छोड़, विचार कर देखो। हे देवताओं के शत्रु! सब गहनों से सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ों के बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती॥ २॥ 

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥ 
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं॥ 

रामविमुख पुरुष की सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पाने के समान है। जिन नदियों के मूल में कोई जलख्नोत नहीं है (अर्थात्‌ जिन्हें केवल बरसात का ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥३॥

सुनु दसकंठ कहडऊेँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥ 
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥ 

हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजी के साथ द्रोह करने वाले तुमको नहीं बचा सकते॥ ४॥

दो०-- मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान। 
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३॥ 

मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमान का त्याग कर दो और रघुकुल के स्वामी, कृपा के समुद्र भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजे का भजन करो॥ २३॥

जदपि कही कपि अति हित बानी । भगति बिबेक बिरति नय सानी॥ 
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥

यद्यपि हनुमानूजीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी हुई बहुत ही हितकी वाणी कही,तो भी वह महान्‌ अभिमानी रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला!॥ १॥

मृत्यु निकट आईं खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥ 
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥

रे दुष्ट) तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमानूजीने कहा-- इससे उलटा ही होगा (अर्थात्‌ मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिभ्रम (बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है॥२॥


सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना । बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥ 
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥

हनुमानूजीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया [और बोला--] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्‍यों नहीं हर लेते ? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियोंके साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे॥ ३॥

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥ 
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥

उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं! कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा-भाई ! यह सलाह उत्तम है॥ ४॥

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठड्टअ बंदर॥

यह सुनते ही रावण हँसकर बोला--अच्छा तो, बंदरको अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाय॥ ५॥

दो०--कपि कें ममता पूंछ पर सबहि कहें समुझाइ। 
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ २४॥

मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर होती है। अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर फिर आग लगा दो॥ २४॥

पूँछीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लड् आइहि॥ 
जिन्ह के कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥

जब बिना पूँछ का यह बंदर वहाँ ( अपने स्वामीके पास) जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आयेगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो देखूँ!॥ १॥

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइट सहाय सारद में जाना॥ 
जातुधान सुनि रावन बचना । लागे रखें मूढ़ सोड़ रचना॥

यह वचन सुनते ही हनुमानजी मन में मुसकराये [ और मन-ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि देनेमें| सहायक हुई हैं। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही ( पूँछमें आग लगाने की) तैयारी करने लगे॥ २॥

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूछ कीन्ह कपि खेला॥ 
कौतुक कहूँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हॉँसी॥

[पूँछके लपेटने में इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि] नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमानजी ने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासी लोग तमाशा देखने आये। वे हनुमानजी को पैर से ठोकर मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं॥३॥

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥ 
पावक जरत देखि हनुमंता। भय उठ परम लघुरूप तुरंता॥

ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमानजी को नगर में फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्नि को जलते हुए देखकर हनुमानजी तुरंत ही बहुत छोटे रूप में हो गये॥ ४॥

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं॥

बन्धन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं॥ ५॥

दो०-- हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। 
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥ २५॥

उस समय भगवान्‌ की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे। हनुमानजी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाश से जा लगे॥ २५॥

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥ 
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥ 

देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं॥ १॥

तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥ 
हम जो कहा यह कपि नहिं होईं। बानर रूप धरें सुर कोई॥ 

हाय बप्पा! हाय मैया ! इस अवसर पर हमें कौन बचावेगा ? [ चारों ओर ] यही पुकार सुनायी पड़ रही है । हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानर का रूप धरे कोई देवता है !॥ २॥ 

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥ 
जारा नगरू निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ 

साधुके अपमान का यह फल है कि नगर अनाथ के नगरकी तरह जल रहा है। हनुमानजी ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला। एक विभीषण का घर नहीं जलाया॥ ३॥ 

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ 

[शिवजी कहते हैं--] हे पार्वती! जिन्होंने अग्नि को बनाया, हनुमानजी उन्हीं के दूत हैं। इसी कारण वे अग्रि से नहीं जले। हनुमानजी ने उलट-पलटकर (एक ओर से दूसरी ओर तक) सारी लड्ढा जला दी। फिर वे समुद्र में कूद पड़े॥ ४॥ 

दो०-पूँछ बुझाइ खोड़ श्रम धरि लघु रूप बहोरि। 
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउठ कर जोरि॥ २६॥ 

पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर हनुमानजी श्रीजानकीजी के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए॥ २६॥ 

मातु मोहि दीजे कछ चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥ 
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥ 

[हनुमानूजीने कहा--] हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजी ने मुझे दिया था। तब सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमानजी ने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥ १॥ 

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ 
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥ 

[जानकीजी ने कहा--] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना--हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुखियों) पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ | अतः उस विरद को याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिये॥ २॥ 

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥ 
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥

हे तात! इन्द्रपुत्न जयन्त की कथा (घटना) सुनाना और प्रभु को उनके बाणका प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि महीने भर में नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे॥ ३॥

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना । तुम्हहू तात कहत अब जाना॥ 
तोहि देखि सीतलि भइ छाती । पुनि मो कहूँ सोइ दिनु सो राती॥

हे हनुमान्‌! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जानेको कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!॥ 

दो०-- जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह। 
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥ २७॥

हनुमानूजीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज दिया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामजीके पास गमन किया॥ २७॥

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥ 
नाधि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥

चलते समय उन्होंने महाध्वनि से भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिरने लगे। समुद्र लाँघकर वे इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलकिला शब्द (हर्षध्वनि)सुनाया॥ १॥

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥ 
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥

हनुमानजी को देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने अपना नया जन्म समझा। हनुमान्‌जी का मुख प्रसन्न है और शरीरमें तेज विराजमान है, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि] ये श्रीरामचन्द्रजी का कार्य कर आये हैं॥२॥

मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥

सब हनुमानजी से मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर नये-नये इतिहास (वृत्तान्त) पूछते-कहते हुए श्रीरघुनाथजी के पास चले॥ ३॥ 

तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥ 
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥


तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मतिसे सबने मधुर फल [या मधु और फल] खाये। जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग छूटे॥ ४॥

दो०--जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज। 
सुनि सुग्रीव हरष कपषि करि आए प्रभु काज॥ २८॥

उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर आये हैं॥ २८॥

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥ 
एहि बिधि मन बिचार कर राजा । आइ गए कपि सहित समाजा॥

यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्‍या वे मधुवनके फल खा सकते थे ? इस प्रकार राजा सुग्रीय मनमें विचार कर ही रहे थे कि समाज-सहित वानर आ गये॥ १॥

आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥ 
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥

सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने उत्तर दिया--] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है। श्रीरामजीकी कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशेष सफलता हुई है) ॥ २॥

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥ 
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥

हे नाथ! हनुमानूने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमानूुजीसे फिर मिले और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३॥

राम कपिन्ह जब आवत देखा। किए काजु मन हरष बिसेषा॥ 
फटिक सिला बेठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥

श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े ॥ ४॥

दो०--प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज। 
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥ २९॥ 

दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। [ वानरोंने कहा--] हे नाथ! आपके चरणकमलों के दर्शन पाने से अब कुशल है॥ २९॥

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥ 
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥

जाम्बवानने कहा-हे रघुनाथजी! सुनिये। हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं॥१॥

सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥ 
प्रभु कीं कृपा भयउठ सबु काजू । जन्म हमार सुफल भा आजू॥

वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणों का समुद्र बन जाता है । उसी का सुन्दर यश तीनों लोकों में प्रकाशित होता है। प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो गया॥ २॥

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी । सहसहूँ मुख न जाइ सो बरनी॥ 
पवनतनय के चरित सुहाएं। जामवंत रघुपतिहि. सुनाए॥

है नाथ! पवनपुत्र हनुमानू ने जो करनी की, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान ने हनुमानजी के सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजी को सुनाये॥ ३॥

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हिये लाए॥ 
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥

[वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमानजी को फिर हृदय से लगा लिया और कहा-हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणों की रक्षा करती हैं ?॥४॥

दो०--नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। 
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥ ३०॥

(हनुमानजी ने कहा--) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रों को अपने चरणों में लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस मार्ग से ? ॥ ३० ॥

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदय लाइ सोइ लीन्ही॥ 
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥

चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया। [हनुमानजी ने फिर कहा--] हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकीजी ने मुझसे कुछ वचन कहे--॥ १॥ 

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ 
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हों त्यागी॥

छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना [ और कहना कि] आप दीनबबन्धु हैं, शरणागत के दुःखो को हरनेवाले हैं और मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप)ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया ?॥ २॥

अवगुन एक मोर में माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥ 
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥

[हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३ ॥

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ 
नयन स्त्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥

विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [ अग्नि और पवनका संयोग होनेसे ]यह शरीर क्षणमात्रमें जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर सुखी होनेके लिये) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी आगसे भी देह जलने नहीं पाती॥ ४॥

सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भत्रि दीनदयाला॥

सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा) ॥ ५॥

दो०-- निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। 
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ ३१॥

हे करुणानिधान |! उनका एक-एक पल कल्पके समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये॥ ३१॥

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥ 
बचन कार्य मन मम गति जाही। सपनेहूँ बूझिआ बिपति कि ताही॥

सीताजीका दुःख सुनकर सुख के धाम प्रभु के कमलनेत्रों में जल भर आया [और वे बोले--] मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति हो सकती है ?॥१॥

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ 
केतिक बात प्रभु जातुधान की । रिपुह्दि जीति आनिबी जानकी॥ 

हनुमानजी ने कहा-हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसों की बात ही कितनी है ? आप शत्रुको जीतकर जानकीजी को ले आवेंगे॥ २॥

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥ 
प्रति उपकार करों का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

[ भगवान्‌ कहने लगे--] हे हनुमान्‌ ! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युयकार (बदलेमें उपकार) तो कया करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता॥ ३॥

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखे करि बिचार मन माहीं॥ 
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥

हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमान्‌जी को देख रहे हैं। नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है॥४॥

दो०--सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। 
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥ ३२॥

प्रभु के वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न] मुख तथा [पुलकित] अंगों को देखकर हनुमानजी हर्षित हो गये और प्रेम में विकल होकर “हे भगवन्‌! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो” कहते हुए श्रीरामजी के चरणों में गिर पड़े॥ ३२॥

बार बार प्रभु चहइ् उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥ 
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥

प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए हनुमान्‌जीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल हनुमानूजीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी प्रेममग्र हो गये॥ १॥

सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥ 
कपि उठाइ प्रभु हृदय लगावा । कर गहि परम निकट बैठावा॥

फिर मनको सावधान करके शंकरजी अत्यन्त सुन्दर कथा कहने लगे--हनुमानजी को उठाकर प्रभु ने हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया॥ २॥

कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥ 
प्रभु॒ प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥ 

हे हनुमान! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लड्डा और उसके बड़े बाँके किले को तुमने किस तरह जलाया? हनुमानजी ने प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले-- ॥ ३॥

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥ 
नाधि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥

बंदर का बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघ कर सोन का नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़ डाला, ॥ ४॥

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥

यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी! आपहीका प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है॥५॥

दो०- ता कह प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल। 
तव प्रभाव बड़वानलहि जारि सकइक्‍इ खलु तूल॥ ३३॥।

हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभाव से रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है] बड़वानल को निश्चय ही जला सकती है (अर्थात्‌ असम्भव भी सम्भव हो सकता है) ॥ ३३॥

नाथ भगति अति सुखदायनी | देहु कृपा करि अनपायनी॥ 
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी । एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥

है नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिये। हनुमानजी की अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने 'एवमस्तु” (ऐसा ही हो) कहा॥ १॥

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ 
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥

है उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती ! यह स्वामी-सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया॥ २॥

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा । जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥ 
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलें कर करहु बनावा॥

प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे--कृपालु आनन्दकन्द श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा--चलने की तैयारी करो॥ ३॥

अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहूँ आयसु दीजे॥ 
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥

अब विलम्ब किस कारण किया जाय ? वानरोंको तुरंत आज्ञा दो। [ भगवान्‌की] यह लीला (रावणवधकी तैयारी) देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाशसे अपने-अपने लोकको चले॥ ४॥

दो०--कपिपति बेगि बोलाएं आए जूथप जूथ। 
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥ ३४॥

वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके समूह आ गये। वानर- भालुओं के झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें अतुलनीय बल है॥ ३४॥

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥ 
देखी राम सकल कपि सेना। चितड कृपा करि राजिव नेना॥

वे प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाते हैं। महान्‌ बलवान्‌ रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्रीरामजी ने वानरोंकी सारी सेना देखी। तब कमलनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली॥१॥

राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहूँ गिरिंदा॥ 
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥

रामकृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गये। तब श्रीरामजीने हर्षित होकर प्रस्थान (कूच) किया। अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए॥ २॥

जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥ 
प्रभु पयान जाना बेैदेहीं । फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥

जिनकी कीर्ति सब मड़लोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय शकुन होना, यह नीति है (लीलाकी मर्यादा है)। प्रभुका प्रस्थान जानकीजीने भी जान लिया। उनके बायें अड़ फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं]॥३॥

जोड़ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥ 
चला कटकु को बरनें पारा। गर्जहिं बानर भालू अपारा॥

जानकीजीको जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावणके लिये अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं॥४॥ 

नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इल्छाचारी॥ 
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥

नख ही जिनके श्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलनेवाले रीकछ-वानर पर्वतों और वक्षोंको धारण किये कोई आकाशमार्गसे और कोई पृथ्वीपर चले जा रहे हैं। वे सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। [उनके चलने और गजनेसे] दिशाओंके हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं॥५॥

छं०--चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। 
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किनर दुख टरे॥ 
कटकट८हिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। 
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहों ।

दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चञ्ल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब-के-सब मनमें हर्षित हुए कि [ अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबलप्रताप कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो ' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहोंको गा रहे हैं॥१॥


सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। 
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥ 
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। 
जनु कमठ खर्पर सर्पपाज सो लिखत अबिचल पावनी॥

उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्‌) सर्पराज शेषजी भी सेना का बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः  कच्छप की कठोर पीठको दाँतों से पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात्‌ बार-बार दाँतों को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दर प्रस्थानयात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेष जी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों॥ २॥

दो०--एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। 
जहूँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५॥

इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्र तट पर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ ३५॥ 

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका । जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥

वहाँ (लड्ढामें) जब से हनुमानजी लड्डा को जलाकर गये, तब से राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरो में सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुल की रक्षा [का कोई उपाय] नहीं है॥ १॥

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥

जिसके दूत का बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर कौन भलाई है (हम लोगों की बड़ी बुरी दशा होगी) ? दूतियो से नगरनिवासियो के वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत ही व्याकुल हो गयी॥ २॥

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥ 
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियें धरहू॥

वह एकान्त में हाथ जोड़कर पति (रावण) के चरणों लगी और नीतिरस में पगी हुई वाणी बोली-हे प्रियतम! श्रीहरि से विरोध छोड़ दीजिये। मेरे कहने को अत्यन्त ही हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिये॥ ३॥

समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥ 
तासु नारि निज सचिव बोलाईं। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥

जिनके दूत की करनीका विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसों को स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी ! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मन्त्री को बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्री को भेज दीजिये॥ ४॥

तव कुल कमल बिपिन दुखदाई । सीता सीत निसा सम आईं॥ 
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हे । हित न तुम्हार संभु अज कीनहें॥

सीता आपके कुलरूपी कमलों के वन को दुःख देनेवाली जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीता को दिये (लौटाये) बिना शम्भु और ब्रह्मा के किये भी आपका भला नहीं हो सकता॥ ५॥

दो०-- राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। 
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ ३६॥

श्रीरामजी के बाण सर्पो के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेढक के समान। जब तक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल नहीं जाते) तब तक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये॥ ३६॥ 

भ्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥ 
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महें भय मन अति काचा॥

मूर्ख और जगत्प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानों से उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा [और बोला--] स्त्रियों का स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मड़ल में भी भय करती हो! तुम्हारा मन (हृदय) बहुत ही कच्चा (कमजोर) है॥१॥

जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥ 
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥

यदि वानरों की सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवननिर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डर से काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसी की बात है॥२॥

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभा ममता अधिकाई॥ 
मंदोदरी हृदय कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥

रावण ने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदय से लगा लिया और ममता बढ़ाकर ( अधिक स्नेह दर्शाकर ) वह सभा में चला गया। मन्दोदरी हृदय में चिन्ता करने लगी कि पति पर विधाता प्रतिकूल हो गये॥ ३ ॥

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आईं॥ 
बूझेसि सचिव उच्चित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥

ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि शत्रु की सारी सेना समुद्रके उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियों से पूछा कि उचित सलाह कहिये [अब क्या करना चाहिये ?]। तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये (इसमें सलाह की कौन-सी बात है ?) ॥ ४॥

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥

आपने देवताओं और राक्षसों को जीत लिया, तब तो कुछ श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं ?॥ ५॥

दो०--सचिव बेद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ३७॥

मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि [अप्रसन्नता के] भय या [लाभ की] आशा से [हित की बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [क्रमशः ] राज्य, शरीर और धर्म- इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ ३७॥

सोइ रावन कहूँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥ 
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥ 

रावणके लिये भी वही सहायता (संयोग ) आ बनी है । मन्त्री उसे सुना-सुनाकर (मुँहपर ) स्तुति करते हैं। [इसी समय] अवसर जानकर विभीषणजी आये। उन्होंने बड़े भाई के चरणों में सिर नवाया॥ १॥

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन | बोला बचन पाह अनुसासन॥ 
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहडऊेँ हित ताता॥

फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बैठ गये और आज्ञा पाकर ये वचन बोले-हे कृपालु ! जब आपने मुझसे बात (राय) पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हँ--॥ २॥

जो आपन चाहे कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥ 
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥

जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकारके सुख चाहता हो,वह हे स्वामी! परस्त्री के ललाटको चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग दे (अर्थात्‌ जैसे लोग चौथके चन्द्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे) ॥ ३॥

चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टह नहिं सोई॥ 
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥

चौदहों भुवनोंका एक ही स्वामी हो, वह भी जीवों से वैर करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणों का समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्‍यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता॥ ४॥

दो०--काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। 
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ ३८॥

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ--ये सब नरकके रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं॥ ३८॥

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ 
ब्रह्मा अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता॥

हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान्‌ हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं॥१॥

गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥ 
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ 

उन कृपाके समुद्र भगवानने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओंका हित करनेके लिये ही मनुष्य-शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिये, वे सेवकोंको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंके समूहका नाश करनेवाले और वेद तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले हैं॥ २॥

ताहि बयरू तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहूँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥

वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागतका दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर) को जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले श्रीरामजीको भजिये॥ ३॥

सरन गए प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ 
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोड़ प्रभु प्रगट समुझु जिये रावन॥

जिसे सम्पूर्ण जगतसे द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्‌) मनुष्यरूप में प्रकट हुए हैं। है रावण! हृदय में यह समझ लीजिये ॥ ४॥

दो०--बार बार पद लागउें बिनय करउेँं दससीस। 
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ॥ ३९ ( क )॥

हे दशशीश ! मैं बार-बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को त्यागकर आप कोसलपति श्रीरामजीका भजन कीजिये॥ ३९ (क)॥

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। 
तुरत सो में प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥ ३९ ( ख )॥

मुनि पुलस्त्यजी ने अपने शिष्य के हाथ यह बात कहला भेजी है। हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) से कह दी॥ ३९ (ख)॥

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥ 
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥

माल्यवान्‌ नामका एक बहुत ही बुद्धिमान्‌ मन्त्री था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना [और कहा--] हे तात! आपके छोटे भाई नीतिविभूषण (नीति को भूषणरूप में धारण करने वाले अर्थात्‌ नीतिमान्‌) हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदय में धारण कर लीजिये॥ १॥

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हड् कोऊ॥ 
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहड़ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥ 

[रावणने कहा--] ये दोनों मूर्ख शत्रुकी महिमा बखान रहे हैं। यहाँ कोई है ? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान्‌ तो घर लौट गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे--॥ २॥

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ 
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥

हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदय में रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की सम्पदाएँ (सुख की स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाम में विपत्ति (दुःख) रहती है॥३॥

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥

आपके हृदयमें उलटी बुद्धि आ बसी है। इसी से आप हित को अहित और शत्रु कों मित्र मान रहे हैं। जो राक्षसकुल के लिये कालरात्रि [के समान] हैं, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है ॥ ४॥

दो०-- तात चरन गहि मागउें राखहु मोर दुलार। 
सीता देहु राम कहूँ अहित न होइ तुम्हार॥ ४०॥

हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ) कि आप मेरा दुलार रखिये (मुझ बालक के आग्रह को स्त्रेहपूर्वक स्वीकार कीजिये) । श्रीरामजी को सीताजी दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो॥ ४०॥

बुध पुरान श्रुति संगत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥ 
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥

विभीषण ने पण्डितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत (अनुमोदित) वाणीसे नीति बखानकर कही। पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गयी है!॥१॥

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥ 
कहसि न खल अस को जग माहीं । भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥

ओरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात्‌ मेरे ही अन्न से पल रहा है), पर हे मूढ! पक्ष तुझे शत्रु का ही अच्छा लगता है। आरे दुष्ट! बता न, जगत्‌ में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओं के बल से न जीता हो ?॥ २॥

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥ 
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥

मेरे नगर में रहकर प्रेम करता है तपस्वियों पर। मूर्ख ! उन्हीं से जा मिल और उन्हीं को नीति बता। ऐसा कहकर रावण ने उन्हें लात मारी। परन्तु छोटे भाई विभीषण ने (मारनेपर भी) बार-बार उसके चरण ही पकड़े॥ ३॥

उमा संत कह इहइ बड़ाईं। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा । रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥

[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! संत की यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करने पर भी [बुराई करनेवालेकी ] भलाई ही करते हैं। [विभीषणजी ने कहा--] आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजी को भजने में ही है॥ ४॥

सचिव संग ले नभ पथ गयऊ । सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥

[इतना कहकर] विभीषण अपने मन्त्रियों को साथ लेकर आकाशमार्ग में गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे--॥ ५॥

दो०--रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। 
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥ ४१॥

श्रीरामजी सत्यसंकल्प एवं [सर्वसमर्थ] प्रभु हैं और [हे रावण!] तुम्हारी सभा कालके वश है। अतः मैं अब श्रीरघुवीरकी शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना॥४१॥

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब  तबहीं॥ 
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल के हानी॥

ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये (उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी )। [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी ! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याण की हानि (नाश) कर देता है॥१॥

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥

रावणने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य) से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मनमें अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजी के पास चले॥ २॥

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥ 
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥

[वे सोचते जाते थे--] मैं जाकर भगवान्‌ के कोमल और लाल वर्ण के सुन्दर चरणकमलों के दर्शन करूँगा, जो सेवकों को सुख देनेवाले हैं, जिन चरणों का स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या तर गयीं और जो दण्डकवन को पवित्र करनेवाले हैं॥३॥ 

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥ 
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥

जिन चरणों को जानकीजी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपटमृग के साथ पृथ्वी पर [उसे पकड़नेको ] दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात्‌ शिवजी के हृदयरूपी सरोवर में विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हीं को आज मैं देखूँगा॥४॥

दो०-- जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। 
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ ४२॥

जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रोंसे देखूँगा॥४२॥

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥ 
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥

इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्रके इस पार (जिधर श्रीरामचन्द्रजी की सेना थी) आ गये। वानरों ने विभीषण को आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रु का कोई खास दूत है॥ १॥

ताहि राखि कपीस पहिं आए । समाचार सब ताहि सुनाए॥ 
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥

उन्हें [पहरेपर] ठहरा कर वे सुग्रीव के पास आये और उनको सब समाचार कह सुनाये। सुग्रीव ने [ श्रीरीमजी के पास जाकर] कहा--हे रघुनाथजी ! सुनिये, रावण का भाई [आपसे] मिलने आया है॥ २॥

कह प्रभु सखा बूझिए काहा। कहउ कपीस सुनहु नरनाहा॥ 
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥

प्रभु श्रीरामजी ने कहा--हे मित्र ! तुम क्या समझते हो (तुम्हारी क्‍या राय है) ? वानरराज सुग्रीव ने कहा-हे महाराज! सुनिये, राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला (छली) न जाने किस कारण आया है॥३॥

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥ 
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥

[जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय। [श्रीरामजी ने कहा-हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी। परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना!॥ ४॥ 

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥

प्रभुके वचन सुनकर हनुमानजी हर्षित हुए [और मन-ही-मन कहने लगे कि] भगवान्‌ कैसे शरणागत वत्सल (शरणमें आये हुएपर पिता की भाँति प्रेम करनेवाले) हैं॥५॥

दो०-- सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। 
ते नर पाँवर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ४३॥

[ श्रीरीमजी फिर बोले-- ] जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर हैं, पापमय हैं; उन्हें देखने में भी हानि है (पाप लगता है) ॥ ४३॥

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आए सरन तजउ नहिं ताहू॥ 
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं॥१॥

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥ 
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥

पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह (रावण का भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदय का होता तो क्‍या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?॥२॥

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥ 
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥

जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-हिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपने को कुछ भी भय या हानि नहीं है॥३॥

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महूँ तेते॥ 
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥

क्योंकि हे सखे ! जगत्‌ में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभर में उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरे शरण आया है तो मैं उसे प्राणों की तरह रखूँगा॥ ४॥

दो०--उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। 
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ ४४॥

कृपा के धाम श्रीरामजी ने हँसकर कहा-दोनों ही स्थितियों में उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान सहित सुग्रीवजी 'कृपालु श्रीरामकी जय हो कहते हुए चले॥ ४४॥ 

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥ 
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥

विभीषणजीको आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणा की खान श्रीरघुनाथजी थे। नेत्रों को आनन्द का दान देनेवाले (अत्यन्त सुखद) दोनों भाइयों को विभीषणजी ने दूर ही से देखा॥ १॥

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥ 
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥

फिर शोभा के धाम श्रीरामजी को देखकर वे पलक [मारना] रोककर ठिठक कर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये। भगवान्‌ की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमल के समान नेत्र हैं और शरणागत के भय का नाश करने वाला साँवला शरीर है॥२॥

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥ 
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥

सिंहके-से कंधे हैं, विशाल वक्ष:स्थल (चौड़ी छाती) अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवों के मनको मोहित करने वाला मुख है। भगवान्‌ के स्वरूप को देखकर विभीषणजी के नेत्रों में [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। फिर मन में धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे ॥ ३॥

नाथ दसानन कर में भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥ 
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूँ। हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षसकुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अन्धकार पर सहज स्नेह होता है॥ ४॥

दो०-- श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। 
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ ४५॥

मैं कानों से आप का सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव (जन्म-मरण) के भय का नाश करनेवाले हैं। हे दुखियों के दुःख दूर करनेवाले और शरणागत को सुख देनेवाले श्रीरघुवीर ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये॥ ४५॥

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥ 
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदय लगावा॥ 

प्रभु ने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत्‌ करते देखा तो वे अत्यन्त हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषणजी के दीन वचन सुनने पर प्रभु के मन को बहुत ही भाये। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उनको हृदय से लगा लिया॥ १॥

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥ 
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥

छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामजी भक्तों के भय को हरनेवाले वचन बोले--हे लंकेश! परिवारसहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास बुरी जगह पर है॥ २॥

खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥ 
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥

दिन-रात दुष्टों की मण्डली में बसते हो। [ऐसी दशामें ] हे सखे।| तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है ? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती॥ ३॥

बरू भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देड बिधाता॥ 
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौ तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥

हे तात! नरक में रहना अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका संग [कभी] न दे। [विभीषणजीने कहा--] हे रघुनाथजी! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है॥४॥

दो०-- तब लगि कुसल न जीव कहूँ सपनेहुँ मन बिश्राम। 
जब लगि भजत न राम कहूँ सोक धाम तजि काम ॥ ४६॥

तबतक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्र में भी उसके मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर श्रीरामजी को नहीं भजता॥ ४६॥

तब लगि हदये बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥ 
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥

लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी तक हृदयमें बसते हैं, जबतक कि धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी हृदय में नहीं बसते॥ १॥

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ 
तब लगि बसति जीव मन माहीं । जब लगि प्रभु प्रताप रब नाहीं॥ 

ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओं को सुख देनेवाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभी तक जीव के मनमें बसती है, जबतक प्रभु (आप) का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता॥ २॥

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥

हे श्रीरामजी ! आपके चरणारविन्द के दर्शन कर अब मैं कुशलसे हूँ, मेरे भारी भय मिट गये। हे कृपालु! आप जिस पर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकार के भवशूल (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते॥ ३॥

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ । सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥ 
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदय मोहि लावा॥

मैं अत्यन्त नीच स्वभाव का राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप 
मुनियों के भी ध्यानमें नहीं आता, उन प्रभु ने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया॥ ४॥ 

दो०-- अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। 
देखेउे नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥ ४७॥ 

हे कृपा और सुख के पुञ्न श्रीरामजी! मेरा अत्यन्त असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और  शिवजी के द्वारा सेवित युगल चरणकमलों को अपने नेत्रों से देखा॥ ४७॥ 

सुनहु सखा निज कहडऊें सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही॥ 

[ श्रीरीमजीने कहा--] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड-चेतन जगत का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तक आ जाय,॥ १॥

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार--॥ २॥ 

सब के ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥

इन सबके ममत्वरूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो  अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धों का केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है॥३॥ 

अस सज्जन मम उर बस कैसें | लोभी हृदय बसइ धनु जैसें॥ 
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरे देह नहिं आन निहोरें॥

ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदयमें धन बसा करता है। तुम-सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। में और किसीके निहोरे से (कृतज्ञतावश) देह धारण नहीं करता॥ ४॥

दो०--सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। 
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ ४८ ॥

जो सगुण (साकार) भगवान्‌ के उपासक हैं, दूसरे के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणों के समान हैं॥ ४८ ॥

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥ 
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥

हे लंकापति ! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय हो। श्रीरामजी के वचन सुनकर सब वानरों के समूह कहने लगे--कृपा के समूह श्रीरामजीकी जय हो!॥ १॥

सुनत बिभीषनु प्रभु के बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥ 
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदय समात न प्रेमु अपारा॥

प्रभु की वाणी सुनते हैं और उसे कानों के लिये अमृत जानकर विभीषणजी अपघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्रीरामजी के चरणकमलों को पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, हृदय में समाता नहीं है॥ २॥

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल  उर अंतरजामी॥ 
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥

[विभीषणजीने कहा--] हे देव! हे चराचर जगत्‌ के स्वामी ! हे शरणागत के रक्षक! हे सबके हृदय के भीतर की जानने वाले।! सुनिये, मेरे हृदय में पहले कुछ वासना थी, वह प्रभु के चरणों की प्रीतिरूपी नदी में बह गयी॥ ३॥

अब कृपाल निज भगति पावनी | देहु सदा सिव मन भावनी॥ 
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥

अब तो हे कृपालु! शिवजी के मन को सदैव प्रिय लगनेवाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। “एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजी ने तुरंत ही समुद्र का जल माँगा॥ ४॥

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीों॥ 
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ 

[और कहा--] हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगत्‌में मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता)। ऐसा कहकर श्रीरामजीने उनको राजतिलक कर दिया। आकाशसे पुष्पोंकी अपार वृष्टि हुई॥५॥

दो०--रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। 
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥ ४९ (क )॥

श्रीरामजीने रावणके क्रोधरूपी अग्निमें, जो अपनी (विभीषणकी) श्वास (वचन) रूपी पवन से प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए विभीषण को बचा लिया और उसे अखण्ड राज्य दिया॥ ४९ (क)॥

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिए दस माथ। 
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥ ४९ ( ख )॥ 

शिवजीने जो सम्पत्ति रावण को दसों सिरों की बलि देने पर दी थी, वही सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी ने विभीषण को बहुत सकुचते हुए दी॥ ४९ (ख)॥ 

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥ 

ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु हैं।अपना सेवक जानकर विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया। प्रभुका स्वभाव वानरकुलके मनको [बहुत] भाया॥ १॥

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक | कारन मनुज दनुज कुल घालक॥

फिर सब कुछ जाननेवाले, सबके हृदय में बसनेवाले, सर्वरूप (सब रूपोंमें प्रकट), सबसे रहित, उदासीन, कारण से (भक्तोंपर कृपा करनेके लिये) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसोंके कुलका नाश करनेवाले श्रीरामजी नीति की रक्षा करने वाले वचन बोले--॥ २॥

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥ 
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥

हे वीर वानरराज सुग्रीव और लड्ढापति विभीषण ! सुनो, इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाय ? अनेक जाति के मगर, साँप और मछलियों से भरा हुआ यह अत्यन्त अथाह समुद्र पार करने में सब प्रकार से कठिन है॥३॥

कह लंकेस सुनहु रघुनायक | कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥ 
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥ 

विभीषणजी ने कहा-हे रघुनाथजी ! सुनिये, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रों को सोखनेवाला है (सोख सकता है), तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा) कि [पहले ] जाकर समुद्र से प्रार्थना की जाय॥४॥

दो०- प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। 
बिनु प्रयास सागर तरिहे सकल भालु कपि धारि॥ ५०॥

हे प्रभु! समुद्र आप के कुल में बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचारकर उपाय बतला देंगे। तब रीछ और वानरों की सारी सेना बिना ही परिश्रम के समुद्र के पार उतर जायगी॥ ५०॥

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ देव जौं होडइ सहाई॥ 
मंत्रन यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥

[ श्रीरामजीने कहा--] हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया। यही किया जाय, यदि दैव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मणजीके मनको अच्छी नहीं लगी। श्रीरामजीके वचन सुनकर तो उन्होंने बहुत ही दुःख पाया॥ १॥

नाथ देव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥ 
कादर मन कहुँ एक अधारा। देव देव आलसी पुकारा॥

[लक्ष्मणजीने कहा--] हे नाथ! दैवका कौन भरोसा! मनमें क्रोध कीजिये (ले आइये) और समुद्रको सुखा डालिये। यह दैव तो कायरके मनका एक आधार (तसल्ली देनेका उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥२॥

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥ 
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥

यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले--ऐसे ही करेंगे, मनमें धीरज रखो। ऐसा कहकर छोटे भाईको समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी समुद्रके समीप गये॥ ३॥

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥ 
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥

उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारे पर कुश बिछाकर बैठ गये। इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभु के पास आये थे, त्यों ही रावण ने उनके पीछे दूत भेजे थे॥ ४॥

दो०--सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। 
प्रभु गुन हृदय सराहहिं सरनागत पर नेह॥ ५१॥

कपटसे वानरका शरीर धारण कर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं। वे अपने हृदय में प्रभु के गुणों की और शरणागत पर उनके स्नेह की सराहना करने लगे॥ ५१॥ 

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥ 
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥

फिर वे प्रकटरूपमें भी अत्यन्त प्रेमके साथ श्रीरामजीके स्वभावकी बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया! तब वानरोंने जाना कि ये शत्रुके दूत हैं और वे उन सबको बाँधकर सुग्रीवके पास ले आये॥ १॥

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥ 
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥

सुग्रीवने कहा--सब वानरो।! सुनो, राक्षसोंके अज्ग-भज्ग करके भेज दो। सुग्रीवके वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतोंको बाँधकर उन्होंने सेनाके चारों ओर घुमाया॥ २॥

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥ 
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥

वानर उन्हें बहुत तरह से मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा। [तब दूतों ने पुकारकर कहा-- ] जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरामजी की सौगंध है॥ ३॥

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥ 
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥

यह सुनकर लक्ष्मणजी ने सबको निकट बुलाया। उन्हें बड़ी दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसों को तुरंत ही छुड़ा दिया। [और उनसे कहा--] रावण के हाथ में यह चिट्ठी देना [और कहना--] हे कुलघातक ! लक्ष्मण के शब्दों (सँदेसे) को बाँचो॥ ४॥

दो०--कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। 
सीता देइ  मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥ ५२॥।

फिर उस मूर्ख से जबानी यह मेरा उदार (कृपा से भरा हुआ) सन्देश कहना कि सीताजी को देकर उनसे (श्रीरामजीसे) मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया [समझो] ॥ ५२॥

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥। 
कहत राम जसु लंकाँ आए । रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥

लक्ष्मणजी के चरणों में मस्तक नवाकर, श्रीरामजी के गुणों की कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिये। श्रीरामजी का यश कहते हुए वे लड्ढा में आये और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाये॥ १॥ 

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥ 
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी । जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥

दशमुख रावणने हँसकर बात पूछी--अरे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता ? फिर उस विभीषणका समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यन्त निकट आ गयी है॥२॥

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी॥ 
पुनि कहु भालु कीस कटकाई | कठिन काल प्रेरित चलि आईं॥


मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका  त्याग दिया। अभागा अब जौ का कीड़ा (घुन) बनेगा (जौ के साथ जैसे घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर-वानरोंके साथ वह भी मारा जायगा); फिर भालु और वानरों की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणासे यहाँ चली आयी है॥३॥

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥ 
कहु तपसिन्ह के बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥

और जिनके जीवन का रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र बन गया है (अर्थात्‌ उनके और राक्षसोंके बीच में यदि समुद्र न होता तो अबतक राक्षस उन्हें मारकर खा गये होते)। फिर उन तपस्वियों की बात बता, जिनके हृदय में मेरा बड़ा डर है॥४॥

दो०-- की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। 
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ ५३॥

उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानों से मेरा सुयश सुनकर ही लौट गये ? शत्रुसेना का तेज और बल बताता क्‍यों नहीं ? तेरा चित्त बहुत ही चकित (भौंचक्का-सा) हो रहा है॥ ५३॥

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥ 
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥

[दूतने कहा--] हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिये (मेरी बात पर विश्वास कीजिये)। जब आपका छोटा भाई श्रीरामजी से जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही श्रीरामजी ने उसको राजतिलक कर दिया॥१॥

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥ 
अ्रवन नासिका काटे लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥

हम रावण के दूत हैं, यह कानों से सुनकर वानरों ने हमें बाँधकर बहुत कष्ट दिये, यहाँतक कि वे हमारे नाक-कान काटने लगे। श्रीरामजी की शपथ दिलाने पर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा॥ २॥ 

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाईं॥ 
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥

हे नाथ! आप ने श्रीरामजी की सेना पूछी; सो वह तो सौ करोड़ मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। अनेकों रंगों के भालु और वानरों की सेना है, जो भयंकर मुखवाले, विशाल शरीरवाले और भयानक हैं॥३॥

जेहिं पुर दहेउ हतेड सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥ 
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥

जिसने नगर को जलाया और आपके पुत्र अक्षयकुमार को मारा, उसका बल तो सब वानगरों में थोड़ा है। असंख्य नामों वाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियों का बल है और वे बड़े ही विशाल हैं॥४॥

दो०--द्वेबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। 
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ ५४॥

द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जांबवान ये सभी बल की राशि हैं॥ ५४॥

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥ 
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥

ये सब वानर बल में सुग्रीवके समान हैं और इनके-जैसे [एक-दो नहीं ] करोड़ों हैं, उन बहुत-सों को गिन ही कौन सकता है? श्रीगामजी की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकों को तृण के समान [तुच्छ] समझते हैं॥ १॥

अस में सुना श्रवन दसकंधर । पदुम अठारह जूथप बंदर॥ 
नाथ कटक महूँ सो कपि नाहीं । जो न तुम्हहि जीते रन माहीं॥

हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके॥ २॥

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥ 
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥

सब-के-सब अत्यन्त क्रोध से हाथ मीजते हैं। पर श्रीरघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपों सहित समुद्र को सोख लेंगे। नहीं तो, बड़े-बड़े पर्वतों से उसे भरकर पूर (पाट) देंगे॥ ३॥

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥ 
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥

और रावण को मसलकर धूलमें मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लड्ढा को निगल ही जाना चाहते हैं॥४॥

दो०--सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। 
रावन काल कोटि कहूँ जीति सकहिं संग्राम॥ ५५॥

सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिर पर प्रभु (सर्वेश्वर) श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राम में करोड़ों कालों को जीत सकते हैं॥ ५५॥

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥ 
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूछेउँ नय नागर॥

श्रीरामचन्द्रजी के तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धिकी अधिकता को लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाणसे सैकड़ों समुद्रोंकी सोख सकते हैं, परन्तु नीतिनिपुण श्रीरामजी ने [नीति की रक्षा के लिये] आपके भाई से उपाय पूछा॥ १॥

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥ 
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥ 

उनके (आपके भाई के) वचन सुनकर वे (श्रीरामजी) समुद्र से राह माँग रहे हैं, उनके मन में कृपा भरी है [इसलिये वे उसे सोखते नहीं ]। दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा [ और बोला--] जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है॥ २॥

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥ 
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाईं। रिपु बल बुद्धि थाह में पाई॥

स्वाभाविक ही डरपोक विभीषण के वचन को प्रमाण करके उन्होंने समुद्र से मचलना (बालहठ) ठाना है। अरे मूर्ख | झूठी बड़ाई क्या करता है ! बस, मैंने शत्रु (राम) के बल और बुद्धि की थाह पा ली॥ ३॥

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥ 
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी । समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥

जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगत्‌ में विजय और विभूति (ऐश्वर्य) कहाँ! दुष्ट रावण के वचन सुनकर दूत को क्रोध बढ़ आया। उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली॥ ४॥

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥ 
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥ 

[और कहा--] श्रीरामजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिये। रावण ने हँसकर उसे बायें हाथ से लिया और मन्त्री को बुलवाकर वह मूर्ख उसे बँचाने लगा॥५॥

दो०-- बातन्ह मनहि रिझ्लाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। 
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईंस॥ ५६ ( क )॥

[पत्रिकामें लिखा था--] अरे मूर्ख! केवल बातों से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट-भ्रष्ट न कर! श्रीरामजी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण जानेपर भी नहीं बचेगा॥ ५६॥ (क) ॥

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भूंग। 
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥ ५६ ( ख )॥

या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भाँति प्रभु के चरण-कमलों का भ्रमर बन जा। अथवा रे दुष्ट | श्रीरामजी के बाणरूपी अग्नि में परिवारसहित पतिंगा हो जा (दोनों में से जो अच्छा लगे सो कर) ॥ ५६ (ख) ॥

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥ 
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥

पत्रिका सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, परन्तु मुख से (ऊपरसे) मुसकराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा--जैसे कोई पृथ्वीपर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है (डींग हाँकता है) ॥ १॥

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥ 
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा । नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥

शुक (दूत) ने कहा--हे नाथ! अभिमानी स्वभाव को छोड़कर [इस पत्र में लिखी] सब बातों को सत्य समझिये। क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिये। हे नाथ! श्रीरामजी से बैर त्याग दीजिये॥ २॥

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥ 
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही । उर अपराध न एकउ धरिही॥

यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यन्त ही कोमल है। मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदय में नहीं रखेंगे॥ ३॥

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥ 
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥ 

जानकीजी श्रीरघुनाथजीको दे दीजिये। हे प्रभु! इतना कहना मेरा कौजिये। जब उस (दूत) ने जानकीजी को देने के लिये कहा, तब दुष्ट रावण ने उसको लात मारी॥ ४॥

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥ 
करि प्रनामु निज कथा सुनाईं। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥

वह भी [विभीषणकी भाँति] चरणों में सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथ जी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजीकी कृपा से अपनी गति (मुनिका स्वरूप) पायी ॥ ५॥

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी । राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥ 
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहूँ पगु धारा॥

(शिवजी कहते हैं--) हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषिके शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजी के चरणों की वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया॥ ६॥

दो०--बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। 
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ ५७॥

इधर तीन दिन बीत गये, किन्तु जड समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोध सहित बोले--बिना भय के प्रीति नहीं होती !॥ ५७॥

लछिमन बान सरासन आनू। सोषों बारिधि बिसिख कृसानू॥ 
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥

हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाणसे समुद्रको सोख डालूँ। मूर्खसे विनय, कुटिलके साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूससे सुन्दर नीति (उदारताका उपदेश), ॥ १॥

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥ 
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥


ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यन्त लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शान्ति) की बात और कामी से भगवान्‌ की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात्‌ ऊसर में बीज बोने की भाँति यह सब व्यर्थ जाता है) ॥ २॥

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥ 
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥


ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक [अग्नि] बाण सन्धान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी ॥ ३॥ 

 

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥ 
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गये। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थालमें अनेक मणियों (रत्रों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया॥ ४ ॥

दो०--काटेहिं पड़ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। 
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥ ५८॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी ! सुनिये, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है (रास्ते पर आता है) ॥ ५८॥

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥ 
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥

समुद्रने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा-हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी--इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड है॥१॥

तव॒ प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥ 
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥

आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थों ने यही गाया है। जिसके लिये स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने में सुख पाता है॥ २॥

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही । मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥ 
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥

प्रभुने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दण्ड) दी; किन्तु मर्यादा (जीवोंका स्वभाव) भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गाँवार, शूद्र, पशु और स्त्री--ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं॥३॥

प्रभु प्रताप में जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥ 
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥

प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभु की आज्ञा अपेल है (अर्थात्‌ आपकी आज्ञाका उल्लड्डन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ॥ ४॥

दो०--सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। 
जेहि बिधि उतरे कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ ५९॥


समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने मुसकराकर कहा-हे तात! जिस 
प्रकार वानरोंकी सेना पार उतर जाय, वह उपाय बताओ ॥ ५९॥

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई | लरिकाई रिषि आसिष पाई॥ 
तिन्ह कें परस किए गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥

[समुद्रने कहा--] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से  आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्रपर  तैर जायँगे॥ १॥

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहठ बल अनुमान सहाई॥ 
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ | जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥

मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर अपने बल के अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बँधाइये, जिससे तीनों लोकों में आपका सुन्दर यश  गाया जाय॥ २॥

एहिं सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥ 
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥

इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिये। कृपालु और  रणधीर श्रीरामजी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात्‌ बाण से उन दुष्टरोंका  वध कर दिया) ॥ ३॥

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा । चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥

श्रीरामजी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टों का 
सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया। फिर चरणों की वन्दना करके समुद्र चला गया॥ ४॥

छं०-- निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। 
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ 
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। 
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ॥ 

समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत (उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है। श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका सब आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन। 

दो०--सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६०॥

श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मड़लोंका देनेवाला है। जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वेबिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागरको तर जायँगे॥६०॥


मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम


इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्ञमः सोपानः समाप्त:। 
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका 
यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।


( सुन्दरकाण्ड समाप्त )